पत्ते की आकृति टखने से लटकी झूलती है, फिर भी उलटी स्थिति में संसार उसके चारों ओर गति में है। ठहराव अब अंतराल नहीं, फंदा है, एक क्षण जिसे अंतर्दृष्टि लानी चाहिए थी, पर जो केवल बेचैनी पैदा करता है। देर शरद के पुराने जैतून के बाग़ याद आते हैं। डालियाँ अपना भार थामे हैं, फल अभी नहीं बटोरा गया। काटने वालों को यहाँ होना चाहिए था, प्राचीन जालों के साथ पेड़ों के बीच रुक कर, पर हवा उठती है और वर्षा धमकी देती है। इसके बदले फल पकने के पार टिका रहता है, अपनी जगह सख़्त होता जाता है, कोल्हू पर अपने क्षण से वंचित। ऐसे वर्ष आते हैं जब तूफ़ान अविराम होते हैं, जब सीढ़ियाँ बेकार पड़ी रहती हैं और टोकरियाँ शेड में सूखी रहती हैं, और आगे हर क़दम भूमि स्वयं ठुकरा देती है।
ऐसी हठ केवल मौसम में नहीं, पत्थर और मिट्टी में भी है। यूनान की एक पहाड़ी की कल्पना कीजिए, धूल भरी सीढ़ियों में सीढ़ीदार, जहाँ पुराने परिवार कभी लकड़ी की शहतीरों और ग्रेनाइट के पहियों के भार तले तेल पेरते थे। कोल्हू मौन बैठा है, शहतीर झूले के बीच अटकी, उन हाथों की प्रतीक्षा में जो कहीं और व्यस्त हैं। फिर भी फ़सल सदा के लिए टाली नहीं जा सकती। पक्षी फल को कुरेदते हैं, और गांठदार तनों के नीचे की भूमि चिकनी, विश्वासघाती हो जाती है, जब न बटोरे जैतून गिर कर सड़ते हैं। ऋतु की हठ रुकी मशीनरी में प्रतिबिंबित होती है, उस थमे उद्योग में जो अपनी जड़ता मानने से इनकार करता है।
ऐसे समय आते हैं जब रुकना चुनाव नहीं, संसार की माँग होती है। दूर की रसोइयों में नमकीन जैतून ऊँची ताकों पर काँच के मर्तबानों में प्रतीक्षा करते हैं, हर गुज़रते महीने के साथ उनका स्वाद और जटिल होता जाता है। फिर भी मर्तबान खोलना, उसकी सामग्री चखना, स्वयं एक इनकार बन सकता है। यह नकार कि प्रतीक्षा का समय समाप्त हो चुका है। ऐसी देरी में अवसर बिना देखे फिसल जाता है। सूर्य डूबता है, वर्षा आती है, और खिड़कियों से देखते तोड़ने वाले सोचते हैं कि क्या बाग़ अगले वर्ष संभलेगा।
औज़ारों की भी बात होती है। पिछली वर्ष के काम से मंद धार वाला पिटा काटने का हुक रस्सी की एक कुंडली के पास विश्राम करता है, दोनों तब एक ओर रख दिए गए जब वर्षा की पहली बूँदें गिरीं। एक ऊनी लबादा है, पेड़ों के बीच ठंडी सुबहों के लिए बुना, जो अब खलिहान में धूल समेटता है। उसकी खुरदरी बुनाई चरवाहे के कुत्ते के अडिग पीछा की याद दिलाती है, जो नीची, तीखी झाड़ी से भेड़ों के झुंड का चक्कर लगाता था। बलात् प्रतीक्षा के काल में ये रोज़ की वस्तुएँ बहुत देर थामे ठहरावों की याद बन जाती हैं, उस श्रम की जो शुरू हो सकता था पर दहलीज़ पर हिचकिचाता है, ठीक वैसे जैसे उलटा लटका व्यक्ति भूमि के ऊपर घूमता है, न लटकन को गले लगाने को तैयार और न मुक्ति को।
कोई पेड़ों के बीच चल सकता है, यह नोट करते हुए कि कौन सी डालियाँ सबसे भारी फल थामे हैं और कौन सी पक्षियों के लिए छोड़ दी गई हैं। वे अपने औज़ारों पर तेल लगा सकते हैं, तैयारी में, भले आकाश वर्षा की धमकी दे। गर्म, सुगंधित तेल में मुट्ठी भर पके जैतून भिगोना समय के गुज़रने को चिह्नित कर सकता है, एक शांत अनुष्ठान उस बदलाव को देखने का जो तब आता है जब प्रतीक्षा अब फलदायी नहीं, हठी हो चुकी हो। या वे लबादा सी सकते हैं, बाग़ में लौटने की यात्रा के लिए उसे पैबंद लगा कर, यह स्वीकार करते हुए कि फिर शुरू करने के लिए पहले ठहराव को मानना पड़ता है।
आज का भाग्य रंग गहरा जैतून है।
Lucky Color: DarkOliveGreen — #556B2Fठहराव को उर्वर होने दीजिए। गति को फिर चलने दीजिए।